37 मिनट पहले
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मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने प्रेग्नेंसी के बाद अपनी ट्रेनिंग के लिए अनुमति न मिले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। दरअसल परिवीक्षा अवधि के दौरान उर्वशी गर्भवती हो गईं। आईपीएस ट्रेनिंग के मौजूदा नियमों के अनुसार, उन्हें अपने मूल बैच के साथ प्रशिक्षण छोड़ना पड़ता है और बच्चे के जन्म के बाद किसी दूसरे बैच में शामिल होना पड़ता है।
प्रेग्नेंट अधिकारियों को घुड़सवारी, लंबी दूरी की दौड़ और युद्ध प्रशिक्षण जैसी शारीरिक रूप से कठिन गतिविधियों से भी छूट दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा नियमों के पीछे के तर्क पर सवाल उठाए। बेंच ने केंद्र से पूछा कि डिलीवरी के बाद मेडिकली फिट घोषित की गई और ट्रेनिंग लेने की इच्छुक महिला अधिकारी को अपनी परिवीक्षा अवधि पूरी करने से क्यों रोका जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या मातृत्व किसी अधिकारी की करियर प्रगति में बाधा बन जाना चाहिए, खासकर तब जब ट्रेनिंग फिर से शुरू करने में बाधा डालने वाली कोई मेडिकल प्रॉब्लम न हो।
Supreme Court hears challenge to a 1993 Office Memorandum of the Ministry of Home Affairs that prevents women IPS probationers from joining training for a year after childbirth despite claiming to be medically fit. (Urvashi Sengar v. Union of India). Bench: Justices Manoj Misra… pic.twitter.com/AyFySaZOyr— Bar and Bench (@barandbench) July 10, 2026
कोर्ट ने सुनवाई बंद की
सुप्रीम कोर्ट ने उर्वशी सेंगर को फिलहाल चल रही ट्रेनिंग में शामिल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 9 हफ्ते में से तीन हफ्ते की ट्रेनिंग हो चुकी है। इससे साफ है कि आप अच्छी तरह से ट्रेनिंग नहीं कर पाएंगी। हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया कि इससे महिला IPS की सीनियरिटी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) महिला IPS की मूल याचिका पर मेरिट के आधार पर सुनवाई करे।

1993 के पुराने नियम को चुनौती क्यों?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा है कि आज के समय में ऐसे फैसले पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होने चाहिए।
1993 का यह नियम सभी गर्भवती अधिकारियों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू होता है और इसमें फेज-1 और फेज-2 की ट्रेनिंग के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है।
फेज-2 में मुख्य रूप से कक्षा आधारित पढ़ाई, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण होता है, जो शारीरिक रूप से ज्यादा कठिन नहीं है। इसलिए केवल गर्भावस्था के आधार पर बाहर करना ठीक नहीं है।
साल 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने महिला IAS अधिकारियों के लिए इस पुराने नियम में बदलाव कर दिया था, जिसके तहत अब IAS महिला प्रोबेशनरों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर ट्रेनिंग पूरी करने की इजाजत मिलती है। ऐसे में IPS अधिकारियों के लिए 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
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