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3 घंटे पहले
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एम.एम. सोमैया ने हॉकी से संन्यास के बाद भारत पेट्रोलियम के स्पोर्ट्स विभाग में काम किया था।
भारत के पूर्व हॉकी खिलाड़ी एम.एम. सोमैया के बेंगलुरु स्थित घर से चोर 1980 मॉस्को ओलंपिक का गोल्ड मेडल ले गए। 28 अक्टूबर की रात हुई इस चोरी के वक्त 67 साल के सोमैया परिवार के साथ कोडागु गए हुए थे।
चोर गोल्ड मेडल के अलावा 1982 एशियन गेम्स का सिल्वर, 1986 एशियन गेम्स का ब्रॉन्ज और 1982 चैंपियंस ट्रॉफी का ब्रॉन्ज मेडल भी ले गए। सोने के गहने, चांदी के सामान और 30 हजार रुपए नकद भी चोरी हुए। पुलिस ने कुल चोरी की कीमत 3.53 लाख रुपए आंकी है।
चोरी का पता तब चला, जब एक पड़ोसी ने सोमैया के घर का दरवाजा खुला देखा और उन्हें सूचना दी। पड़ोसी के घर लगे CCTV कैमरों की फुटेज में रात करीब 2:34 बजे दो संदिग्ध घर में घुसते दिखे। एक ने नीली और दूसरे ने लाल शर्ट पहन रखी थी।
1980 में 16 साल बाद भारत ने जीता था गोल्ड
मॉस्को ओलंपिक का गोल्ड भारतीय हॉकी के लिए खास था। भारत ने इससे पहले 1964 टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड जीता था। 1980 में टीम 16 साल बाद फिर ओलंपिक चैंपियन बनी। इससे पहले भारतीय टीम 1928 से 1956 तक लगातार छह ओलंपिक गोल्ड जीत चुकी थी।
फाइनल में भारत ने स्पेन को 4-3 से हराया था। सुरिंदर सिंह सोढ़ी ने दो गोल किए, जबकि मोहम्मद शाहिद और एम.के. कौशिक ने एक-एक गोल किया।
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1980 मॉस्को ओलंपिक में भारत की टीम।
इंटरनेशनल डेब्यू के साथ ही ओलंपिक गोल्ड जीता
एम.एम. सोमैया का पूरा नाम मानेयापांडा मुथन्ना सोमैया है। उनका जन्म 8 मई 1959 को कर्नाटक के मर्कारा (अब मदिकेरी) में हुआ था। उनके पिता बॉम्बे हॉकी एसोसिएशन के सदस्य थे। सोमैया पांच साल की उम्र से हॉकी देखते थे और 12 साल की उम्र में खेलने लगे।
बाद में माइकल सालदान्हा ने उन्हें महिंद्रा एंड महिंद्रा की टीम में खेलने का मौका दिया। 1975 से वे बॉम्बे की जूनियर और सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप टीमों का हिस्सा बनने लगे। 1980 मॉस्को ओलंपिक में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेब्यू किया और टीम के साथ गोल्ड जीता।
एस्ट्रो टर्फ पर खेलने के लिए बजरी के मैदान पर तैयारी
मॉस्को ओलंपिक में भारतीय टीम के सामने एस्ट्रो टर्फ पर खेलने की चुनौती थी। यह कृत्रिम घास से बना मैदान होता है, जिस पर गेंद प्राकृतिक घास के मुकाबले तेजी से चलती है। भारतीय खिलाड़ी तब तक ज्यादातर प्राकृतिक घास पर खेलते आए थे।
इस बदलाव के लिए कोच बालकृष्ण सिंह ने बेंगलुरु में बजरी के मैदान पर अभ्यास कराया। इससे खिलाड़ियों को तेज सतह पर खेलने की तैयारी करने में मदद मिली। सोमैया ने भी बाद में बताया था कि एस्ट्रो टर्फ पर खेलना उनके लिए नया अनुभव था।

एस्ट्रो टर्फ कृत्रिम घास से बना हुआ मैदान होता है।
तीन ओलंपिक में खेले, 1988 में कप्तानी भी की
मॉस्को के बाद सोमैया ने 1984 लॉस एंजिलिस और 1988 सियोल ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1988 में वे भारतीय टीम के कप्तान बने। उन्होंने दो हॉकी वर्ल्ड कप, दो एशियन गेम्स, दो एशिया कप और तीन चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट में भी देश के लिए खेला। उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

