जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक एशियन गेम्स-2026 का आयोजन होगा। इसमें बिहार के 11 खिलाड़ी (6 दिव्यांग) भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।
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इस बार के एशियन गेम्स में बिहार की भागीदारी 120% बढ़ी है। 2023 के हांगझोउ एशियन गेम्स में बिहार के 5 खिलाड़ी शामिल हुए थे। इस बार खिलाड़ियों की संख्या दोगुना से अधिक है।
भास्कर की स्पेशल रिपोर्ट में पढ़िए बिहार के कौन से खिलाड़ी एशियन गेम्स में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने वाले हैं। इनकी क्या कहानी है। 1- शैलेश कुमार; दाहिने पैर में पोलियो, खेत में नंगे पांव की प्रैक्टिस
शैलेश कुमार का जन्म जमुई के इस्लामनगर गांव में हुआ था। उन्हें बचपन से दाहिने पैर में पोलियो है। किसान परिवार से आते हैं। माता-पिता अफसर बनाना चाहते थे, लेकिन शैलेश ने स्पोर्ट्स में अपना करियर बनाया।
शैलेश ने खेत में नंगे पांव प्रैक्टिस शुरू की। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए पिता ने कर्ज लिया, खेत तक गिरवी रखनी पड़ी। उन्होंने बताया, ‘लोग ताने मारते थे। कहते थे लंगड़ाते हुए ओलिंपिक मेडल कैसे हासिल करोगे। मैंने अपनी मेहनत से सबका मुंह बंद कर दिया।’
शैलेश ने बताया, ‘स्कूल में प्रतियोगिता हुई तो किसी ने बिना पूछे मेरा नाम दे दिया था। अपना नाम सुनकर काफी आश्चर्य हुआ। मैंने तीनों प्रतियोगिता में भाग लिया और अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद से स्पोर्ट्स में रुचि जगी।’
शैलेश 2011 से स्पोर्ट्स में एक्टिव हैं। नंगे पांव खेत में दौड़कर प्रैक्टिस करते थे। स्पोर्ट्स शू के लिए पैसे नहीं थे। 2017 में नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में नंगे पांव खेलते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता था। एशियन पैरा गेम्स के स्वर्ण पदक विजेता शैलेश समाज कल्याण विभाग में बाल विकास प्रोजेक्ट ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं।
2- सोमन राणा; लैंड माइन ब्लास्ट में खोया दायां पैर
गयाजी के सोमन राणा के पिता किसान हैं। वह अपने माता-पिता का हाथ बंटाने के लिए खेतों में काम करते थे। आर्मी में जाने का सपना था। खेल में दिलचस्पी नहीं थी।
2001 में उनका सिलेक्शन इंडियन आर्मी में हो गया। जम्मू कश्मीर के पूंछ में पहली पोस्टिंग हुई। ड्यूटी के दौरान लैंड माइन ब्लास्ट की चपेट में आकर अपना दायां पैर खो दिया।
इस घटना के बाद सोमन डिप्रेशन में आ गए थे। इलाज के लिए पुणे गए। वहां अपने जैसे लोगों को देखकर फिर से जिंदगी जीने की उम्मीद जगी।
44 साल के सोमन ने जीवन को नई दिशा देने का फैसला किया। 2012 में उनकी मुलाकात नेशनल गेम्स खेले चुके पैरा प्लेयर्स से हुई। उन्होंने आर्मी में पैरा प्लेयर्स को लेकर संपर्क किया। 2017 से पैरा गेम्स में आए।
2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने उन्हें 30 लाख रुपए देकर सम्मानित किया था।
3- झंडू कुमार; 4 साल के थे तो पोलियो मारा
नालंदा के हरनौत निवासी पैरा पावर लिफ्टर झंडू कुमार को 4 साल की उम्र में पोलियो मार दिया था। कमर के नीचे एक तरफ के अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।
झंडू ने कहा, ‘मेरे पिता सब्जी बेचते थे। मुझे पोलियो हुआ तो माता-पिता झाड़-फूंक के लिए ओझा के पास ले गए। उसने लोगों को मेरी कमर पर चढ़वाया। मेरी चीख निकल गई, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ। अंत में मैंने इसे अपनी किस्मत मान ली। मेरे घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी कि बाहर जाकर इलाज कराया जा सके।’
12 साल की उम्र में बॉडी बनाने का जुनून सवार हुआ
झंडू ने बताया, ‘परिवार की मदद के लिए मैं सब्जी बेचने लगा। स्कूल जाता तो क्लास के बच्चे चिढ़ाते थे। कहते थे कि दिव्यांग हूं, कुछ नहीं कर सकता। 12 साल की उम्र में मुझपर बॉडी बनाने का जुनून सवार हुआ। मैंने जिम जॉइन कर ली।’
2018 में मुझे पैरा गेम्स के बारे में पता चला। जल्द ही मैंने पैरा पावर लिफ्टिंग शुरू कर दी। 2022 में कोलकाता गया और नेशनल पैरा चैंपियनशिप में पावर लिफ्टिंग में ब्रॉन्ज मेडल जीता।
इसके बाद झंडू को घर से सपोर्ट मिलना बंद हो गया। माता-पिता को लगता था कि वह फालतू चीजों में पैसे बर्बाद कर रहे हैं। पैसे के लिए वह हरनौत बाजार में फुटपाथ पर आलू प्याज बेचने लगे।
रेंगकर चलते थे, खुद खरीदा व्हीलचेयर
झंडू ने कहा कि पोलियो मारने के बाद वह जमीन पर रेंगकर चलते थे। 2023 में व्हीलचेयर खरीदा। फोरलेन पर एक ओवरब्रिज पास हुआ तो उनकी दुकान हटा दी गई। इसके बाद 1 साल तक ई-रिक्शा चलाया।
2024 खेलो इंडिया गेम्स में झंडू कुमार को खेलने का मौका मिला। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को पहला पदक दिलाया था।
4- मो. शम्स आलम; ट्यूमर ने व्हीलचेयर पर ला दिया
शम्स आलम का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के ‘रथौस’ गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें खेलों का शौक था। शुरुआत में कराटे के खिलाड़ी थे। ब्लैक बेल्ट भी हासिल किया था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद एमबीए किया।
2010 में शम्स की रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में ट्यूमर विकसित हो गया। डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी। सफल सर्जरी के बाद भी मेडिकल कॉम्प्लिकेशन की वजह से उनके शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह से पैरालाइज हो गया। वे हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गए।
इस हादसे ने शम्स को अंदर से तोड़ दिया था, लेकिन उनकी मां के उनका हौसला बढ़ाया। कहा, ‘बेटा, जब अल्लाह एक दरवाजा बंद करता है तो दस खिड़कियां खोल देता है।’ इस सीख के बाद शम्स ने हार मानने के बजाय खुद को फिर से खड़ा करने की ठानी।
तैरने के हुनर को स्पोर्ट्स थेरेपी के रूप में अपनाया
शम्स ने बताया, ‘मेरे घर के पास ही तालाब है, जिसमें मैं बचपन में तैरता था। 2 साल की उम्र में तैरकर तालाब पार कर लेता था।’
रिहैबिलिटेशन के दौरान शम्स की मुलाकात अंतरराष्ट्रीय पैरा तैराक राजाराम घाग से हुई, जिन्होंने उन्हें तैराकी के जरिए नई उम्मीद दी। उन्होंने 2012-13 से पेशेवर तैराकी की शुरुआत की।
5- प्रमोद भगत; 4 साल की उम्र में मारा था पोलियो
वैशाली के हाजीपुर में जन्में प्रमोद भगत 4 साल के थे तब पोलियो के चलते उनका बायां पैर खराब हो गया था। पिता की बहन किशुनी देवी ने उन्हें गोद लिया।
प्रमोद को बचपन से बैडमिंटन का शौक था। पैसे की कमी के कारण एक शटल खरीदकर, कई महीनों तक उससे खेलते थे।
उनके पिता को खेल पसंद नहीं था। वह प्रमोद को पढ़ाई में ध्यान देने के लिए कहते थे। प्रमोद दिन में पढ़ाई करते और रात में चोरी-छिपे बैडमिंटन खेलते थे।
प्रमोद ने 15 साल की आयु में पहला टूर्नामेंट खेला। 2024 में डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन से संबंधित मामले में उन पर 18 महीने का प्रतिबंध लगाया गया था।
6- उमेश विक्रम कुमार; 2 साल की उम्र में मारा था पोलियो
सीतामढ़ी के पुपरी में जन्में उमेश विक्रम कुमार को दो साल की उम्र में बाएं पैर में पोलियो हो गया था। उमेश ने 5वीं क्लास में पढ़ते समय हाई जंप प्रतियोगिता जीती। इसके बाद उनकी स्पोर्ट्स में रुचि जागी।
2011 में उमेश अभ्यास के दौरान चोटिल हो गए थे। उस चोट से उबरने के दौरान, बैडमिंटन खेलना शुरू किया।
2012 में उन्होंने ओडिशा में आयोजित पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप में पहली बार हिस्सा लिया। इसके बाद उनका खेल करियर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। उमेश टाटा स्टील के प्रोक्योरमेंट विभाग में कार्यरत हैं।
7- आरती कुमारी; बाउंसर कहकर मजाक उड़ाते थे लोग
आरती कुमारी नवादा के वारिसलीगंज स्थित पटेल नगर में रहती हैं। इनके पिता संजय प्रसाद किसान हैं। आरती ने अपने भाई राहुल के साथ मैदान पर जाना शुरू किया था। पांच साल पहले सड़क हादसे में राहुल की मौत हो गई।
एथलेटिक्स कोच पंकज कुमार ज्योति के मार्गदर्शन के बाद आरती को रग्बी खेल से जुड़ने का अवसर मिला।
दुबईवाली कहकर मजाक उड़ाते थे लोग
खेल को लेकर आरती को लोगों के ताने सुनने पड़े। भाई की मौत के बाद वह अभ्यास के लिए मैदान जातीं तो कुछ लोग मजाक उड़ाते हुए ‘दुबईवाली’ और ‘बाउंसर’ कहते थे।
आज आरती भारतीय महिला रग्बी सेवन्स टीम में हैं। बिहार पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं।
8- गुड़िया कुमारी; खेलने पर लोगों ने मारे ताने
मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी में रहने वाली गुड़िया कुमारी के पिता राम प्रवेश राय किसान हैं। उन्हें ताने सुनने को मिले। लोग बोलते थे कि इसे शर्म नहीं आती है। सयानी लड़की होकर लड़कों के साथ हाफ पैंट पहनकर खेलती है।
स्थानीय मैदानों में अभ्यास करते हुए गुड़िया ने रग्बी की बारीकियां सीखीं। बिहार रग्बी फुटबॉल एसोसिएशन और प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन से उनके खेल में सुधार हुआ।
गुड़िया भारतीय महिला रग्बी टीम में शामिल हैं। वह अपनी फुर्ती और टैकलिंग के लिए पहचानी जाती हैं। उन्होंने जूनियर एशियन रग्बी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता है।
9- बॉबी कुमार; बचपन में क्रिकेट खेलने का शौक था
पटना के कंकड़बाग निवासी बॉबी कुमार ने सेपक टकरा में बिहार का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। बॉबी बचपन में क्रिकेट खेलते थे।
बॉबी ने 2015 में सेपक टकरा का खेल देखा। इस खेल ने उन्हें आकर्षित किया। सेपक टकरा सीखना शुरू करने के बाद शुरुआती दौर में पारिवारिक दबाव के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा।
इससे खेल के प्रति बॉबी का लगाव कम नहीं हुआ। उन्होंने फिर से मैदान पर वापसी की और नियमित अभ्यास शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और खेल सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ा।
2018 से बिहार सरकार ने उन्हें खेल में आगे बढ़ाने के लिए सहयोग देना शुरू किया। उनका चयन भारतीय खेल प्राधिकरण यानी SAI के प्रशिक्षण केंद्र में हुआ। वहां उन्हें बेहतर खेल सुविधाएं मिलीं। बॉबी तीन बार विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं।
10- ईशान किशन; डिफिनिट के नाम से बुलाते हैं दोस्त
क्रिकेटर ईशान किशन आक्रामक बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग के लिए पहचाने जाते हैं। क्रिकेट के प्रति ईशान की दीवानगी से टीचर परेशान थे। टीचर ने साफ कह दिया कि पढ़ाई और क्रिकेट एकसाथ नहीं चल सकता।
ईशान के दोस्त उन्हें डिफिनिट के नाम से बुलाते हैं। उन्होंने 2021 में इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से डेब्यू किया था।
11- वैभव सूर्यवंशी; प्रैक्टिस करने समस्तीपुर से पटना आते थे
समस्तीपुर के ताजपुर में जन्मे वैभव सूर्यवंशी ने 4 साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। वह प्रैक्टिस करने समस्तीपुर से पटना आते थे।
मां सुबह 3 बजे उठकर वैभव के लिए खाना तैयार करती थी। लॉकडाउन के दौरान जब अकादमी जाना संभव नहीं था तब भी उन्होंने घर की छत पर अभ्यास जारी रखा।
वैभव ने जनवरी 2024 में बिहार की ओर से रणजी ट्रॉफी में डेब्यू किया था। वैभव ने बिहार और मुंबई के बीच रणजी ट्राफी में 12 साल 9 महीने 14 दिन की उम्र में डेब्यू किया। वह सबसे कम उम्र में रणजी में डेब्यू करने वाले दूसरे खिलाड़ी बन गए हैं। उनसे कम उम्र में अलीमुद्दीन ने (12 साल, 2 महीने 18 दिन) डेब्यू किया था।
