Site icon Newsleak

मल्टी स्पोर्ट कल्चर ने ऑस्ट्रेलिया को बनाया एथलेटिक्स सुपर पावर:ओलिंपिक में 7 एथलेटिक्स मेडल जीतने के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स में भी किया टॉप


अगस्त 2025 में डायमंड लीग जीतने वाली निकोला ओलिस्लेगर्स की बात सच साबित हुई कि ऑस्ट्रेलियाई एथलेटिक्स का सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है। पेरिस ओलिंपिक 2024 में 7 मेडल जीतने के बाद अब 2026 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी ऑस्ट्रेलिया का दबदबा रहा। एथलेटिक्स में लगातार तीसरी बार टॉप करते हुए उसने 12 गोल्ड समेत कुल 34 मेडल जीते। एक दिन में रिकॉर्ड 7 गोल्ड आए। विमंस माइल में क्लीन स्वीप; रोज डेविस का 5,000 व 10,000 मीटर में ऐतिहासिक गोल्ड; कर्टिस मार्शल की पोल वॉल्ट में हैट्रिक और मैथ्यू डेनी का डिस्कस थ्रो खिताब प्रमुख रहे। 100 मीटर में सिल्वर जीतने वाले लाचलान कैनेडी और 200 मीटर इतिहास के सबसे तेज टीनएजर (19.67 सेकंड) गाउट गाउट जैसे युवाओं ने कमाल किया। अनुभवी और युवा टैलेंट का यह शानदार प्रदर्शन साबित करता है कि ऑस्ट्रेलियाई एथलेटिक्स अपने स्वर्णिम युग में पहुंच चुका है। 1. एक खेल का बंधन नहीं, इससे विकल्प भरपूर क्रिकेट, रग्बी और स्विमिंग के लिए मशहूर ऑस्ट्रेलिया एथलेटिक्स में इतना सफल कैसे हुआ? इसकी एक बड़ी वजह है- बच्चों को कम उम्र में किसी एक खेल तक सीमित न करना है। 200 मीटर धावक एडेन मर्फी ने सॉकर, वॉटर पोलो और बीएमएक्स जैसे खेल खेले और 14-15 साल की उम्र में एथलेटिक्स चुना। इससे बच्चों पर कम उम्र में प्रदर्शन का दबाव नहीं पड़ता। लाचलान कैनेडी ने रग्बी, स्टुअर्ट मैकस्वेन ने क्रिकेट-टेनिस और जेस हल ने सॉकर से शुरुआत की थी। बाद में इन खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स को अपना करियर बनाया। 2. लिटिल एथलेटिक्स – दौड़ने-कूदने की भी ट्रेनिंग ‘लिटिल एथलेटिक्स’ प्रोग्राम उसकी सफलता की नींव है। 1960 के दशक में शुरू हुआ यह ग्रासरूट प्रोग्राम सितंबर से अप्रैल तक गर्मियों में चलता है। इसमें बच्चों को दौड़ने, कूदने और थ्रो की बुनियादी स्किल्स सिखाई जाती हैं। ओलिस्लेगर्स और नीना कैनेडी जैसे चैम्पियंस ने भी इसी प्रोग्राम से शुरुआत की। युवा एथलीट्स को भी जल्द सीनियर लेवल पर धकेलने के बजाय लंबे करियर के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका असर स्प्रिंट्स में भी दिखा है। ऑस्ट्रेलिया ने ओलिंपिक चैम्पियन कनाडा को हराकर 4×100 मीटर रिले का कॉमनवेल्थ गोल्ड जीता। 3. यूरोप में ट्रेनिंग सेंटर, अमेरिका में भी प्रतिस्पर्धा मजबूत घरेलू सिस्टम के साथ ऑस्ट्रेलिया एथलीट्स को इंटरनेशनल एक्सपोजर भी दे रहा है। उत्तरी इटली में उसका यूरोपियन ट्रेनिंग सेंटर है, जो मई से सितंबर तक यूरोपियन सर्किट में हिस्सा लेने वाले एथलीट्स के लिए दूसरे घर की तरह काम करता है। इसके अलावा हाल के वर्षों में कई ऑस्ट्रेलियाई एथलीट्स ने अमेरिकी कॉलेज सिस्टम का रुख किया है। ओली होरे, जेस हल और एडम स्पेंसर इसके उदाहरण हैं। अमेरिका में उन्हें लगातार हाई लेवल कॉम्पिटिशन मिला, जिससे वे ग्लोबल एथलीट्स के तौर पर विकसित हुए। 4. कॉमनवेल्थ को लेकर गंभीर, ओलिंपिक पर नजर ऑस्ट्रेलिया कॉमनवेल्थ गेम्स को ओलिंपिक चक्र के बीच अहम पड़ाव मानता है। इस बार सभी खेलों में 68 गोल्ड जीतकर ओवरऑल दबदबा बनाया। एथलेटिक्स ऑस्ट्रेलिया की नजर अब ब्रिस्बेन 2032 ओलिंपिक पर है। पेरिस ओलिंपिक के बाद एथलेटिक्स में फंडिंग बढ़ाई गई है। नया मंत्र है- ‘जीतने के बाद भी जीतते रहना।’ मजबूत ग्रासरूट सिस्टम, बेहतर कोचिंग, विदेशी ट्रेनिंग और प्रतिभाओं की बड़ी फौज ने ऑस्ट्रेलिया को एथलेटिक्स के टॉप देशों में पहुंचा दिया है। अब उसका लक्ष्य इस दबदबे को ब्रिस्बेन ओलिंपिक तक कायम रखना है।

Source link

Exit mobile version